नई दिल्ली : भारत ने सिंधु नदी का पानी रोकने की बात की तो पाकिस्तान तुरंत चीन की शरण में चला गया. पाकिस्तान में चीन के विशेषज्ञों से इस पर चर्चा भी हो रही है, जिसमें यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि चीन भी भारत का पानी बंद कर सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन इसमें सफल हो पाएगा? इसका जवाब नहीं में ज्यादा आएगा. इसकी वजह है कि चीन के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट BRI में शामिल देशों में हंगामा मच जाएगा, जिसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं. तिब्बत से निकलने वाली दो बड़ी नदियाँ हैं – सतलुज और ब्रह्मपुत्र. चीन की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि दोनों नदियाँ तिब्बत से शुरू होकर भारत में बहती हैं और फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश को जाती हैं. अगर भारत का पानी रोका गया तो पाकिस्तान और बांग्लादेश सूखे और भूखे मर जाएंगे. बहरहाल भारत में ब्रह्मपुत्र नदी का लगभग 70-80 फीसदी पानी भारत और बांग्लादेश में मानसूनी बारिश से आता है, न कि तिब्बत से. रक्षा जानकार ब्रिगेडियर शार्देन्दु(रि) मानते हैं कि अगर भारत और चीन में कभी युद्ध हुआ तो उस दौरान चीन पानी को एक स्ट्रेटेजिक वेपन के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है.
ब्रह्मपुत्र नदी पर कई सालों से डैम बनाकर चीन भारत के लिए भविष्य में मुसीबत खड़ी करने का सपना देख रहा है. चीन ने अपने 14वें पंचवर्षीय प्लान के तहत दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के निर्माण को मंजूरी दी है. चीन सालाना 300 बिलियन किलोवॉट बिजली के उत्पादन की चाहत रखता है. ब्रह्मपुत्र पर प्रस्तावित मेडोग बांध पर काम जारी है. यह बांध चीन को भारत में वॉटर फ्लो को नियंत्रित करने की तकनीकी क्षमता देंगे. चूंकि चीन के ज्यादातर डैम “रन-ऑफ-द-रिवर” हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट हैं, जिससे पानी को बड़े पैमाने पर रोकने के बजाय बिजली उत्पादन के लिए प्रवाह का इस्तेमाल किया जाता है. इन बांधों में पानी को लंबे समय तक रोकने की क्षमता सीमित है. हालांकि, भारत और चीन के बीच सिंधु जल संधि (IWT) जैसा कोई कानूनी रूप से बाध्यकारी जल-साझा समझौता नहीं है. पहलगाम हमले के बाद तो भारत ने पाकिस्तान के साथ उस बाध्याता को भी खत्म कर दिया है. चीन के साथ सिर्फ मानसून के दौरान 15 मई से 15 अक्टूबर तक ब्रह्मपुत्र और सतलुज के पानी के प्रवाह डेटा साझा करने के लिए MoU हैं. तिब्बत में सतलुज नदी को लांगकेन जाग्बो के नाम से जाना जाता है. सतलुज नदी तिब्बती प्रांत में लगभग 322 किलोमीटर बहती है, उसके बाद सतलुज नदी भाखड़ा बांध तक लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा करती है.
चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर भारत में वॉटर बम फोड़ने की तैयारी कर रहा है, तो उसका इलाज भारत ने भी ढूंढ लिया है. भारत की तरफ से अरुणाचल में दिबांग इलाके में देश का सबसे बड़ा बांध तैयार होने का रास्ता साफ हो गया है. साल 2008 में मनमोहन सरकार के दौरान इस डैम का शिलान्यास किया गया था, लेकिन पर्यावरणीय मंजूरी के चक्कर में प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो सका. लेकिन 11 साल बाद 2019 में मोदी सरकार ने इस डैम को बनाने की मंजूरी दी और इसके बाद से काम की रफ्तार बढ़ गई है. पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल गई है और डैम का काम भी शुरू हो चुका है. इस डैम से न सिर्फ देश के लिए 3000 मेगावाट बिजली उत्पादन होगा, बल्कि चीन की तरफ से पानी रोक अरुणाचल प्रदेश में सूखे की नौबत लाने और ज्यादा पानी छोड़ने से बाढ़ जैसे हालात लाने की साजिश को भी विफल कर देगा. अगर इस डैम की बात करें तो यह अगले 9 सालों में बनकर तैयार हो जाएगा. अगर इसकी ऊंचाई की बात करें तो 288 मीटर ऊंचा यह देश का सबसे बड़ा डैम और एशिया का आठवें नंबर का सबसे बड़ा डैम होगा.
ब्रह्मपुत्र नदी जिसे चीन के कब्जे वाले तिब्बत में यारलुंग सॉंग्पो के नाम से जाना जाता है, भारत को 30 फीसदी पीने का पानी और भारत के हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट के 44 फीसदी की जरूरत को पूरा करती है. तिब्बत से आने वाली सतलुज नदी पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. पंजाब और हरियाणा में गेहूं और धान की खेती प्रभावित हो सकती है. ब्रह्मपुत्र नदी अरुणाचल प्रदेश, असम और बांग्लादेश के लिए लाइफ लाइन है. असम और अरुणाचल प्रदेश में धान और अन्य फसलों की सिंचाई प्रभावित हो सकती है. हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट भी पानी की कमी के चलते प्रभावित हो सकते हैं.











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