नई दिल्ली: अमेरिका के दबदबे वाला अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) पाकिस्तान पर मेहरबान है। आईएमएफ ने पाकिस्तान को एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (ईएफएफ) प्रोग्राम के तहत 1.02 अरब डॉलर (करीब 8,712 करोड़ रुपये) की दूसरी किस्त जारी कर दी है। यह पैसा ऐसे समय पर मिला है जब आईएमएफ पाकिस्तान के आगामी बजट पर ऑनलाइन बातचीत कर रहा है। भारत के साथ तनाव के कारण आईएमएफ के मिशन प्रमुख का इस्लामाबाद दौरा कुछ दिनों के लिए टल गया था। पाकिस्तान सरकार 2 जून को वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बजट पेश करने की योजना बना रही है। आईएमएफ के प्रतिनिधि 16 मई तक पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बजट के प्रावधानों पर चर्चा करेंगे।
पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने बताया है कि आईएमएफ से मिली यह दूसरी किस्त 16 मई को खत्म होने वाले हफ्ते के लिए उसके विदेशी मुद्रा भंडार में दिखाई देगी। इसका मतलब है कि पाकिस्तान के पास अब खर्च करने के लिए कुछ और डॉलर होंगे। पिछले हफ्ते आईएमएफ के निदेशक मंडल ने ईएफएफ प्रोग्राम के तहत 1.02 अरब डॉलर की राशि को मंजूरी दी थी। इसके अलावा, आईएमएफ ने रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (आरएसएफ) के रूप में 1.4 अरब डॉलर की अतिरिक्त व्यवस्था भी की है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आईएमएफ से पाकिस्तान को लगातार मिल रहे लोन के पीछे अमेरिका और चीन की बढ़ती करीबी भी एक कारण हो सकती है। इसका भारत पर असर पड़ सकता है। भारत आईएमएफ में पाकिस्तान को लोन दिए जाने पर अपनी चिंताएं व्यक्त कर चुका है। खासकर सीमा पार आतंकवाद के वित्तपोषण में इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर उसने अपना पक्ष रखा है।
कुछ जानकारों का मानना हो कि अमेरिकी नीतियों में विरोधाभास है या वे भारत के हितों के अनुरूप नहीं हैं। पाकिस्तान चीन का करीबी सहयोगी है। अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक रूप से स्थिर रखने में चीन की भूमिका को महत्व दे सकता है। यह भी माना जाता है कि अमेरिका पाकिस्तान को चीन के पाले में पूरी तरह से जाने से रोकना चाहता है। आईएमएफ के जरिये वित्तीय सहायता प्रदान करना इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
भारत की हमेशा से यह चिंता रही है कि आईएमएफ से मिलने वाली वित्तीय सहायता का इस्तेमाल पाकिस्तान आतंकवाद को प्रायोजित करने के लिए कर सकता है। अगर अमेरिका का झुकाव चीन की तरफ होता है तो भारत की इन चिंताओं को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है।
यही नहीं, अगर पाकिस्तान आर्थिक रूप से स्थिर होता है (भले ही आईएमएफ के लोन के सहारे) तो वह अप्रत्यक्ष रूप से भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां खड़ी कर सकता है। भारत यह भी महसूस कर सकता है कि अमेरिका, जो उसका महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, उसकी चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दे रहा है।











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