मुज़फ्फरनगर : उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में ‘कानून के राज’ के बड़े-बड़े दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे उलट नजर आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अब कानून का खौफ किसी में नहीं रह गया है। हैरानी की बात तो यह है कि जिन लोगों पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी है, वही अब बड़े से बड़े आदेशों को भी नजरअंदाज कर रहे हैं। हालात इतने चिंताजनक हो गए हैं कि ताकतवर लोगों के लिए अब ‘सुप्रीम कोर्ट’ का आदेश भी महज ‘कागज का एक टुकड़ा’ बनकर रह गया है।
मामला मुजफ्फरनगर में जानसठ रोड पर बन रही कॉलोनी द्वारका सिटी से जुड़ा हुआ है। द्वारका सिटी को लेकर पिछले कई वर्षों से लगातार विवाद चलता आ रहा है। द्वारका सिटी के अंदर दक्षिणी सिविल लाइन निवासी गुंजन गुप्ता की भी जमीन चली गई थी। गुंजन गुप्ता ने जब अपनी 3280 मीटर जमीन पर अपना निर्माण करना चाहा, तो विकास प्राधिकरण ने यह कहकर नक्शा पास करने से इनकार कर दिया कि आपकी जमीन द्वारका सिटी में शामिल हो गई है इसलिए इस जमीन पर अब नक्शा पास नहीं हो सकता, गुंजन गुप्ता तभी से इस मामले को लेकर क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
द्वारका सिटी का जब निर्माण किया गया था तो इसमें 11380 वर्ग मीटर जमीन सरकारी चकरोड और नाली थी, इसके विषय में कानून है कि कॉलोनी बनाने वाले डेवलपर को इतनी ही ज़मीन या इतनी ही कीमत की जमीन, बदले में सरकार को देनी होती है और जब ज़मीन सरकार से बदल जाती है, तो बिल्डर उस ज़मीन को अपने उपयोग में ले सकता है। बिल्डरों का अफसरों से साठगांठ होता ही है, इसलिए मुज़फ्फरनगर में ज़्यादातर बिल्डरों ने सरकारी ज़मीनों पर फ्री में ही कब्ज़ा कर रखा है।
इस मामले में गुंजन की अपनी करोड़ों की ज़मीन भी फंस रही थी, तो गुंजन गुप्ता इस मुद्दे की लगातार शिकायतें करते आ रहे है, तो मजबूरी में द्वारका सिटी के मालिको पर दबाव बना, कि वे इतनी ज़मीन बदले में सरकार को दे, लेकिन सारी चकरोड और नाली तो वे प्लाट के रूप में पहले ही बेच चुके है, तो कहाँ से देते ? इसलिए आज तक वह जमीन सरकार को नहीं दी गई।
गुंजन गुप्ता ने सरकार की 11380 मीटर जमीन द्वारका सिटी के मालिकों द्वारा कब्जाए जाने की शिकायत जिला प्रशासन से की, तो निवर्तमान जिलाधिकारी अरविन्द मल्लपा बंगारी ने एक जांच समिति गठित कर दी जिसमे एसडीएम सदर निकिता शर्मा,खतौली के एसडीएम संजय सिंह, बुढ़ाना के एसडीएम न्यायिक प्रवीण कुमार समेत जिला शासकीय अधिवक्ता राजस्व श्रीमती जेबा जमील शामिल थे। इस समिति ने जांच करके अपनी रिपोर्ट डीएम को दी जिस पर डीएम
के निर्देश पर अपर जिलाधिकारी प्रशासन नरेंद्र बहादुर सिंह ने 25 जून 2024 को द्वारका सिटी के मालिक अजय बंसल को एक नोटिस जारी कर दिया, कि जांच में सामने आया है कि आपने सरकारी जमीन कब्ज़ा रखी है और उस पर अवैध निर्माण कर रहे हैं, इसके विषय में 15 दिन में साक्ष्य सहित अपना पक्ष प्रस्तुत करें।
एडीएम की चिट्ठी मिलते ही बिल्डर अजय बंसल, एडीएम को जवाब देने की बजाय ,सहारनपुर के तत्कालीन और वर्तमान में मेरठ के मंडल आयुक्त डॉ. हृषीकेश भास्कर यशोद की शरण में पहुंचे, तो उन्होंने जिला प्रशासन से जबाब तलब कर लिया, जिस पर तत्कालीन जिलाधिकारी अरविंद मल्लप्पा बंगारी ने जांच समिति की जांच रिपोर्ट मंडलायुक्त को भी भेज दी, जिसके बाद कमिश्नर ने इस शासनदेश, कि सरकारी ज़मीन बदले जाने से पहले, कोई निर्माण नहीं किया जा सकता और डीएम की जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिख रखा था कि वहां सरकारी ज़मीन पर अवैध निर्माण हो चुका है, को ताक पर रख दिया और 9 जुलाई 2024 को 11380 मीटर जमीन के बदले में द्वारका सिटी द्वारा प्रस्तावित की जा रही जमीन को स्वीकार करते हुए राजस्व अभिलेख में दर्ज करने के आदेश दे दिए।
बकौल गुंजन गुप्ता, कमिश्नर ने ये आदेश करते हुए, इस बिंदु को भी नज़र अंदाज कर दिया कि उक्त सरकारी ज़मीन, उस तिथि तक और आज 13 जून तक भी, द्वारका सिटी के नाम दर्ज नहीं हुई है, फिर भी रजिस्ट्रार ने किस आधार पर उस सरकारी ज़मीन का बैनामा,लोगों को प्लाट के रूप में कर दिया और विकास प्राधिकरण ने नक्शा पास कैसे कर दिया ?
उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेश संख्या-32/744/2016 दिनांक 03.06.2016 में स्पष्ट रूप से कहा गया है: “जनपद /मंडल/शासन स्तर पर भूमि के पुनर्ग्रहण आदेश निर्गत होने से पूर्व कोई भी निर्माण कार्य आरंभ नहीं किया जा सकता।” फिर भी सरकारी ज़मीन के नाम परिवर्तन से पहले,यदि कोई व्यक्ति सरकारी ज़मीन पर कोई निर्माण कर लेता है तो जिलाधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि उसके खिलाफ सरकारी ज़मीन पर कब्जे के मामले में क़ानूनी कार्यवाही करे, लेकिन इस मामले में मामला बड़े लोगों से जुड़ा है, इसलिए 15 साल से वे लगातार न्याय के लिए अफसरों के चक्कर काट रहे है और कोई कार्यवाही नहीं की जा रही।
मंडलायुक्त के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए शिकायतकर्ता गुंजन गुप्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली, तो वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर गुप्ता के न्यायालय में की गई, जिसमें गुंजन गुप्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी,समदर्शी संजय, मोनिका शर्मा और आशीष कुमार शर्मा ने पैरवी की, जबकि द्वारका सिटी की ओर से विनय गर्ग, अनुभव कुमार, संचित आनंद और मनोज स्वरूप ने बचाव पक्ष की तरफ़ से अपना पक्ष रखा। पूरा मामला सुनने के बाद 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने द्वारका सिटी में चल रहे सभी निर्माण कार्यों पर 28 जुलाई को अगली सुनवाई तक रोक लगा दी थी।
लेकिन मजे की बात है कि, देश की सबसे बड़ी अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद भी, मुज़फ्फरनगर के अफसरों और बिल्डर को कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि इस कॉलोनी में बीजेपी नेता गौरव स्वरुप समेत शहर के बड़े लोग शामिल है, इसलिए किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की और 27 मई से 15 दिन बाद तक भी द्वारका सिटी में निर्माण कार्य बदस्तूर जारी है।
शिकायतकर्ता गुंजन गुप्ता ने बताया कि वह 15 दिन से लगातार विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष कविता मीणा और सचिव कुंवर बहादुर सिंह समेत प्रशासन के सभी अधिकारियों को उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के लिए संपर्क कर रहे हैं, लेकिन आज तक भी निर्माण कार्य नहीं रोके गए हैं।
उन्होंने बताया कि सरकारी चक नंबर 21 में प्लॉट संख्या 7, मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप और उनके पति बीजेपी नेता गौरव स्वरूप ने खरीद रखी है, यह आज भी कागजों में सरकारी चकरोड ही है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद भी आज तक वहां निर्माण कार्य जारी है, जिसकी पिछले कई दिन से लेकर, आज 13 जून, शुक्रवार तक उन्होंने खुद वीडियो ग्राफी की है और विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष कविता मीणा और सचिव कुंवर बहादुर सिंह को सौंप दी है।
उन्होंने बताया कि गत दिवस सहारनपुर में वर्तमान मण्डलायुक्त अटल कुमार राय से मिलकर उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति उपलब्ध करा दी थी। आज उन्होंने जिलाधिकारी उमेश मिश्रा को भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की एक सत्यापित प्रति उपलब्ध करा दी है।
गुंजन गुप्ता का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी 15 दिन से निर्माण कार्य नहीं रोका जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया है कि पालिका अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप खुद संवैधानिक पद पर हैं, उनका भी दायित्व है कि वह शहर में अतिक्रमण पर रोक लगाए, लेकिन वह खुद सरकारी चकरोड की जमीन पर अपनी कोठी का निर्माण कर रही है। गुंजन ने बताया कि मंडलायुक्त ने जो गलत आदेश 9 जुलाई 2024 को किये थे, अगर वह सही होते, तो क्या 11 महीने बाद तक भी, मुज़फ्फरनगर के अफसरों द्वारा, सरकारी भूमि का हस्तान्तरण नहीं कर दिया जाता ?, जिससे साफ़ है कि मुज़फ्फरनगर के अफसर भी जानते है, कि आदेश क़ानूनी रूप से गलत है और बिना भूमि के मालिकाना हक़ के, जो भूमि आज तक भी सरकारी चकरोड है, उस पर पालिका अध्यक्ष समेत अन्य लोगों का अवैध निर्माण जारी है।
गुंजन ने बताया कि वह सभी साक्ष्यों को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे कि देश के सबसे बड़े न्यायालय के आदेश के बाद भी मुजफ्फरनगर में निर्माण कार्य नहीं रोके गए हैं, जिसके उनके पास पर्याप्त वीडियो और फोटो सबूत है।उन्होंने बताया कि वह विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष कविता मीणा और पालिका अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप के खिलाफ भी न्यायालय से दरखास्त करेंगे, कि आदेश का पालन न करने के चलते, इनके विरुद्ध भी अदालत के आदेश की अवमानना की कार्रवाई की जाए।
इस संबंध में जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने बताया कि शिकायतकर्ता गुंजन गुप्ता ने आज उन्हें उच्चतम न्यायालय के आदेश की प्रति उपलब्ध कराई है, जिसके बाद उन्होंने तत्काल ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, अपर जिलाधिकारी प्रशासन, विकास प्राधिकरण, नगर मजिस्ट्रेट और उप जिलाधिकारी सदर को लिखित आदेश जारी कर दिए हैं कि द्वारका सिटी में उच्चतम न्यायालय के अगले आदेश तक कोई निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए। जिलाधिकारी ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी निर्माण कार्य किया गया है, तो उसके विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
गुंजन गुप्ता ने बताया कि द्वारका सिटी के मालिक जिस कंपनी के नाम से यह कॉलोनी बना रहे हैं, दरअसल यह जमीन आज तक उस कंपनी की है ही नहीं, जिसकी शिकायत उन्होंने रजिस्ट्रार के दफ्तर में भी की है, जिसके बाद रजिस्ट्रार ने द्वारका सिटी में बैनामों पर रोक लगा दी है और एआईजी स्टांप व डीजीसी सिविल से विधिक राय लेने की बात की है। गुंजन गुप्ता ने बताया कि मंडल आयुक्त के आदेश के बावजूद, आज तक भी द्वारका सिटी द्वारा दी गई जमीन सरकार के खाते में दर्ज नहीं की गई है, क्योंकि वह जमीन, महंगी जमीन के बदले सस्ती जमीन दी गई थी और इस असंवैधानिक आदेश के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं और न्याय मिलने तक लड़ाई जारी रखेंगे।
उन्होंने बताया कि जब उन्होंने यह मुद्दा उठाया तो विकास प्राधिकरण ने 22 दिसंबर 23 में तहसील को पत्र भेजकर एनओसी जारी करने को कहा है। गुंजन ने कहा कि इस पूरे मामले में इतना बड़ा घोटाला है कि बिना तहसील की एनओसी के और ज़मीन के मालिकाना हक साबित हुए बगैर, विकास प्राधिकरण ने द्वारका सिटी में सरकारी चकरोड और नाली तक पर नक़्शे पास कर दिए, जबकि कोई छोटा सा भी सरकारी ज़मीन पर अवैध निर्माण कर ले, तो बुलडोजर लेकर पहुँच जाते है। इस संबंध में पालिका अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप से भी उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया लेकिन उनके परिवार में एक अत्यन्त दुखद घटना होने के कारण उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है।











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