मेरठ। आगामी भाद्रपद अमावस्या 23 अगस्त 2025 को कुशग्रहणी अमावस्या मनाई जाएगी। इस दिन का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व बहुत ही विशेष माना जाता है। ज्योतिषाचार्य विनोद कुमार मिश्र के अनुसार, इस दिन स्नान, दान, जप, तप, व्रत और पितरों को जल अर्पित करने की परंपरा है।
इस दिन वर्षभर के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और श्राद्ध कर्मों के लिए आवश्यक कुश एकत्र करने का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि कुशाग्रहणी अमावस्या पर किए गए धार्मिक कार्य कर्ज, संकट, और जीवन की अन्य समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सहायक होते हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वर्ष ने बताया कि सनातन संस्कृति में कुश का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। पूजा, दान, सूर्य को अर्घ्य देने और अन्य धार्मिक कार्यों में इसका प्रयोग अनिवार्य माना गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि कुश के बिना पूजा अधूरी और निष्फल मानी जाती है। कुश में ऊर्जा तरंगों को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है। इसलिए कुश के आसन पर बैठकर पूजन, कुश की पवित्री धारण करना, और कुश से पूजन सामग्री का अभिमंत्रण आवश्यक माना गया है।
आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को रसातल से निकाला था, तब उनका शरीर जल से भीग गया। जल को झटकने पर जहां-जहां पानी की बूंदें गिरीं, वहां कुश की उत्पत्ति हुई। इसलिए इसे दैवीय पौधा माना गया है।
ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य दें
कुश एकत्र कर पूजा में उसका उपयोग करें
कुश के आसन पर बैठकर जप और ध्यान करें
गरीबों और ब्राह्मणों को कुशमूल्य दान करें
पितरों के तर्पण से पूर्व कुश की अंगूठी (पवित्री) धारण करें











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