नई दिल्ली : अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी वाला देश चीन पिछले कई दशक से दुनिया की फैक्ट्री बना हुआ है। उसने मैन्युफैक्चरिंग में गजब का काम किया है और वह दुनिया की सप्लाई चेन का अहम हिस्सा है। अमेरिका के साथ पिछले कुछ समय से उसका तनाव चल रहा है। अमेरिका चीन का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है जबकि अमेरिका भी चीन के बड़े ट्रेडिंग पार्टनर्स में शामिल है। लेकिन चीन के साथ ट्रेडिंग में अमेरिका को भारी घाटा है। यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन पर 145% टैरिफ लगाया है। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका पर 125% टैरिफ लगाया है। दोनों में से कोई देश झुकने को तैयार नहीं है।
चीन और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच स्विट्जरलैंड में बैठक हो रही है। लेकिन दोनों पक्षों को इसमें तुरंत कोई हल निकलने की उम्मीद नहीं है। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच समझौता होने में दो से तीन साल का समय लग सकता है। इस समय का इस्तेमाल चीन दुनिया को अपना सस्ता माल खपाने में कर सकता है। अमेरिका के मुकाबले चीन का सामान काफी सस्ता माना जाता है और यही वजह है कि दुनिया के बाजार चीनी माल से पटे पड़े हैं।
अमेरिका के डिफेंस इक्विपमेंट दुनिया में सबसे महंगे माने जाते हैं। मसलन अमेरिका के एफ-22 रैप्टर की कीमत 143 मिलियन डॉलर है। वहीं चीन का चेंगदू जे-20 फाइटर 110 मिलियन डॉलर में मिल जाएगा है। इसे एफ-22 की टक्कर का माना जाता है। हालांकि चीन ने इसकी टेक्नोलॉजी अपने पास ही रखी है। यही वजह है कि जो देश राफेल, एफ-16 और यूरोफाइटर टाइफून जैसे महंगे फाइटर नहीं खरीद पाते वे चीन से सस्ते फाइटर खरीदते हैं।
पूरी दुनिया में चीन के सामान के बारे में कहा जाता है कि चले तो चांद तक, नहीं तो शाम तक। लेकिन चीन अब अपनी इस छवि को बदलना चाहता है। यही वजह है कि उसकी नजर भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे संघर्ष पर है। अगर उसके रक्षा उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ती है तो इससे उसे दुनिया में उनका प्रचार करने का मौका मिलेगा। जेएफ-17 थंडर बनाने वाली कंपनी के शेयर पांच दिन में 50 फीसदी से अधिक चढ़े हैं। इससे पता चलता है कि भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में चीन का क्या फायदा है।











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