नई दिल्ली: भारत ने 11 और 13 मई, 1998 को 5 भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। जब यह खबर सामने आई तो पूरी दुनिया हैरान रह गई। उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि अब हमारे पास एक बड़ा बम बनाने की क्षमता है। तभी से माना जाने लगा था कि भारतीय उपमहाद्वीप में इसके बाद होने वाले विस्फोटों के खेल में भारत का हाइड्रोजन बम उसे पाकिस्तान से बहुत आगे ले जाएगा। वाजपेयी 20 मई को बुद्ध-स्थल पहुंचे और वहीं से देश को एक नया नारा दिया-‘जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान’। उस वक्त खार खाए अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देशों ने भारत को आर्थिक सहायता न देने की धमकी भी दी, मगर भारत इन धमकियों के सामने नहीं झुका। इन परीक्षणों में एक टेस्ट था हाइड्रोजन बम का। मगर, बाद में कई देशों के एक्सपर्ट ने इन परीक्षणों पर सवाल उठाए थे।
सीधे शब्दों में कहें तो हाइड्रोजन बम परमाणु हथियार प्रौद्योगिकी का चरमोत्कर्ष है। स्वाभाविक रूप से भारतीय वैज्ञानिकों ने मई 1998 में आश्चर्यजनक रूप से 7 परमाणु परीक्षण किए थे, उन्होंने हाइड्रोजन बम के विस्फोट को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना। इससे साबित हुआ कि 1974 में पहली बार परमाणु बम विस्फोट करने के बाद से 24 वर्षों में ये वैज्ञानिक गहरी नींद नहीं सो पाए थे। ऐसा माना जाता है कि भारतीयों ने हाइड्रोजन बम को डिजाइन करने की तकनीक में 1996 में ही महारत हासिल की थी। साइंटिस्ट चिदंबरम तो अपने हाइड्रोजन बम को 98 विंटेज कहा करते थे।
परमाणु बम और हाइड्रोजन बम के बीच मुख्य अंतर उनकी ऊर्जा का स्रोत है। परमाणु बम नाभिकीय विखंडन पर आधारित है, जबकि हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन पर आधारित है। हाइड्रोजन बम परमाणु बम की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता है क्योंकि संलयन प्रतिक्रिया विखंडन प्रतिक्रिया की तुलना में अधिक ऊर्जा मुक्त करती है।
1954 में अमेरिका ने पहली बार हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया था जोकि वर्ष 1945 में हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम की तुलना में 1000 गुना अधिक विनाशकारी था। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और रूस हाइड्रोजन बम बना चुके हैं। भारत और इजरायल भी इसका परीक्षण कर चुके हैं। भारत ने 1998 में इस बम का परीक्षण किया था। 2017 में उत्तर कोरिया ने भी हाइड्रोजन बम का टेस्ट किया था।
अमेरिका के नेवादा विश्वविद्यालय, लास वेगास के परमाणु भौतिक विज्ञानी जैजिंग सन के अनुसार, संलयन में हल्के तत्व अत्यधिक तापमान और दबाव से गुजरते हैं, क्योंकि वे आपस में जुड़कर भारी तत्वों का निर्माण करते हैं। इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा मुक्त करते हैं। सन ने कहा कि ईंधन के समान द्रव्यमान के कारण, विखंडन की तुलना में संलयन प्रतिक्रियाएं काफी अधिक ऊर्जा उत्सर्जित करती हैं।
दुनिया का सबसे घातक और ताकतवर हथियार हाइड्रोजन बम है। इसकी ताकत किसी भी परमाणु बम से 1000 गुना ज्यादा होती है। जब 6 अगस्त, 1945 में अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराया था तो 140,000 लोग मारे गए थे और 70 शहर तबाह हो गए थे। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि परमाणु बम से 1500 गुना ताकतवर ‘हाइड्रोजन बम’ की तबाही किस स्तर की होगी।
हाइड्रोजन बम सूर्य की तरह काम करता है। यह लगातार विस्फोटों से गर्मी पैदा करता है। इसे बनाने में Deuterium और Tritium का इस्तेमाल होता है। यह आइसोटोप्स के संलयन के सिद्धांत पर काम करता है। आइसोटोप्स एक ही तत्व के अलग-अलग रूप होते हैं यही क्रिया सूर्य में भी होती है। हाइड्रोजन बम तीन चरणों में फटता है। पहले दो चरणों में 50 लाख डिग्री सेल्सियस गर्मी होती है। यह गर्मी मुख्य रिएक्टर को फटने में मदद करती है। इसके बाद सूर्य जैसी रोशनी होती है। इसे देखने से इंसान अंधा हो सकता है। हाइड्रोजन बम बहुत शक्तिशाली होता है। यह पल भर में किसी शहर को तबाह कर सकता है। ऐसे में एक्सपर्ट इसके इस्तेमाल से बचने की सलाह देते रहे हैं।
संलयन प्रक्रिया ब्रह्मांड में हर जगह है। यह वही है जो सूर्य को शक्ति प्रदान करती है। लेकिन पृथ्वी पर परमाणु संलयन को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसके लिए उच्च तापमान और दबाव की आवश्यकता होती है। यही अतिरिक्त चुनौती है कि वैज्ञानिकों को परमाणु बम की तुलना में हाइड्रोजन बम बनाने में अधिक समय लगता। यही वजह है कि संलयन को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिकों ने मदद के लिए विखंडन की ओर रुख किया।
1961 में सोवियत संघ द्वारा विस्फोटित ज़ार बम ने 50 मेगाटन का विस्फोट किया था, जो जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बमों के संयुक्त विस्फोट से लगभग 1,500 गुना अधिक शक्तिशाली था। वर्तमान अमेरिकी शस्त्रागार में मौजूद सबसे बड़े परमाणु हथियार से 40 गुना अधिक शक्तिशाली था।
हाइड्रोजन बम के जनक के रूप में जाने जाने वाले एडवर्ड टेलर अमेरिका के थर्मोन्यूक्लियर हथियार कार्यक्रम में काम करने वाले सबसे विवादास्पद वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्होंने 1 नवंबर, 1952 को यह बम बनाया था। वैसे 1942 की शुरुआत में ही जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर सहित भौतिकविदों ने यह भविष्यवाणी कर ली थी कि संलयन से पैदा हुई एनर्जी से अत्यधिक शक्तिशाली हथियार बनाया जा सकता है।
हाइड्रोजन बम परमाणु बम से सैकड़ों गुना ज्यादा शक्तिशाली होता है। विस्फोट से प्रकाश, ऊष्मा और अवशेष निकलते हैं। यह सुपरसोनिक गति से कई मील तक फैली शॉक वेव्स भी पैदा करता है। ये तरंगें अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को नष्ट कर देती हैं। तीव्र प्रकाश अंधा कर सकता है और तीव्र गर्मी ज्वलनशील पदार्थों को आग लगा सकती है।
हाइड्रोजन बम को एच-बम भी कहा जाता है। नतीजतन, हाइड्रोजन बम की परिभाषा और एच-बम की परिभाषा दोनों ही परमाणु संलयन द्वारा संचालित थर्मोन्यूक्लियर बम का एक प्रकार है, जो हाइड्रोजन बम की विनाशकारी शक्ति का स्रोत है। परमाणु संलयन तब होता है जब हल्के नाभिक वाले परमाणु आपस में मिलकर भारी नाभिक बनाते हैं। परमाणु संलयन वही प्रतिक्रिया है जो सूर्य और तारों को शक्ति प्रदान करती है।
हाइड्रोजन बम में यूरेनियम, प्लूटोनियम और हाइड्रोजन के दो समस्थानिक (या विविधताएं) ड्यूटेरियम और ट्रिटियम का उपयोग किया जाता है। टेलर-उलम डिजाइन की नींव दो मेन कंपोनेंट या फेज पर आधारित हैं। ये रिएक्शंस की सीरीज में जुड़े होते हैं। हर फेज में अगले फेज को प्रज्वलित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा मिलती है। परमाणु विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया के दौरान अस्थिर परमाणु का नाभिक छोटे नाभिकों में विभाजित हो जाता है। यूरेनियम जैसे भारी तत्वों के विखंडन के दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। विखंडन अभिक्रिया से निकलने वाले न्यूट्रॉन अतिरिक्त परमाणुओं पर बमबारी करते हैं और उन्हें विभाजित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक श्रृंखला अभिक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है।











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