नई दिल्ली : बीते मंगलवार को दिल्ली में तेज बारिश और आंधी की वजह से बहुत सारे पेड़ गिर गए और कई क्षतिग्रस्त हो गए. इससे पहले दो मई को भी तेज आंधी तूफान में भी यही देखने को मिला था. वहीं बीच-बीच में भी आंधी और तेज बारिश की वजह से पेड़ टूट गए जिससे नुकसान झेलना पड़ा. आंधी और बारिश में पेड़ों के टूटने के ज्यादा मामले शहरों में ही क्यों देखने को मिलते हैं. इसका असर गांव में कम क्यों होता है और वहां पर कम पेड़ क्यों टूटते हैं. चलिए जानें.
रिपोर्ट्स की मानें तो शहरों में ज्यादा पेड़ गिरने का कारण उनकी कमजोर जड़ें होती हैं, जो कि सिर्फ सीमित जगह में बढ़ती है. शहरों में अक्सर पेड़ कंक्रीट, डामर या फिर अन्य सतहों के साथ लगाए जाते हैं, जिससे उनकी जड़ें जमीन में गहराई तक फैल नहीं पाती हैं और विकसित नहीं हो पाती हैं. इसके अलावा शहरों में अक्सर एक ही किस्म के पेड़ लगाए जाते हैं, जिससे कि वे आंधी के दौरान ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं और टूटने लगते हैं. पेड़ के आसपास कंक्रीट होने की वजह से पानी किनारों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाता है, इसलिए भी पेड़ कमजोर हो जाते हैं.
विशेषज्ञों की मानें तो गुलमोहर जैसे पेड़ दीमक को जल्दी आकर्षित करते हैं, जो कि उनको खोखला बना देते हैं. यही वजह है कि ऐसे पेड़ आंधी और तेज बारिश में पहले गिर जाते हैं. इसीलिए सड़क के किनारे और सेंट्रल वर्ज पर पौधारोपण साइंटिफिक तरीके से किया जाना चाहिए. कई बार सड़कों पर एक ही तरह के पौधे लगा दिए जाते हैं. इससे पेड़ों की ऊंचाई एक जैसी हो जाती है. यही वजह है कि ऐसे पेड़ आंधी के समय हवा का दबाव नहीं झेल पाते हैं और गिर जाते हैं. अगर मिक्स वैरायटी के पेड़ लगाए जाएं तो इनके गिरने की संभावना कम रहती है.
वहीं गांव में शहरों के मुकाबले कम पेड़ इसलिए गिरते हैं क्योंकि उनकी जड़ें मजबूत और स्थिर होती हैं. गांव के पेड़ जमीन के अंदर गहराई तक जाते हैं. जिससे वे हवा का दबाव बेहतर ढंग से सहन कर पाते हैं. इसके अलावा गांव की मिट्टी अक्सर शहर की तुलना में अच्छी होती है. यह पेड़ों को बचाने में मदद करती है. इसीलिए गांव के पेड़ जल्दी नहीं गिरते हैं शहरों की अपेक्षा.











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