नई दिल्ली: भारत, पाकिस्तान और चीन के परमाणु हथियारों को लेकर अमेरिका काफी टेंशन में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि एशिया में परमाणु हथियारों की दौड़ कम हो। इसके लिए वो रूस, चीन के साथ-साथ भारत और पाकिस्तान जैसे देशों से बातचीत करना चाहते हैं। दरअसल, ट्रंप एक बार फिर परमाणु हथियारों में कटौती को लेकर सार्थक बातचीत करना चाहते हैं। मगर, उनकी मंशा पर ही सवाल उठ रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब अमेरिका और रूस जैसे बड़े देश ही हथियारों में कटौती नहीं कर रहे हैं तो चीन, भारत या पाकिस्तान से यह उम्मीद करना बेकार है। आइए-समझते हैं कि अमेरिका इतना टेंशन में क्यों है? क्या है इन देशों में परमाणु हथियारों की स्थिति।
भारत-पाकिस्तन जैसे दक्षिण एशियाई देशों में परमाणु हथियारों की संख्या हर साल बढ़ रही है। वहीं, परमाणु शक्ति संपन्न तीन देशों में से एक चीन अपनी परमाणु ताकत में तेजी से इजाफा कर रहा है। इससे चिंतित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह दोबारा रूस और चीन के साथ परमाणु हथियारों को कम करने पर बातचीत शुरू करना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस योजना में पाकिस्तान और भारत समेत दूसरे देशों को भी शामिल किया जा सकता है।
दरअसल, पिछले हफ्ते नाटो सेक्रेटरी जनरल मार्क रूट के साथ मुलाकात के दौरान मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि रूस और अमेरिका के पास दुनिया में सबसे अधिक परमाणु हथियार हैं। ट्रंप की चिंता यही है कि इस मामले में अगले 5 साल में चीन अमेरिका की बराबरी कर लेगा। ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में चीन से परमाणु हथियारों में कमी की योजना पर बातचीत में फेल हो गए थे।
स्वीडन के थिंक टैंक ‘SIPRI’ की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार नौ परमाणु हथियार संपन्न देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया और इजरायल अपने परमाणु हथियारों के भंडार को लगातार मॉडर्न बना रहे हैं। इन 9 देशों के पास कुल मिलाकर परमाणु हथियारों की संख्या कम होकर लगभग 12, 121 हो गई है, जो 2023 में 12,512 थी।
SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास 172, जबकि पाकिस्तान के पास 170 परमाणु वॉरहेड हैं। पाकिस्तान भारत का मुकाबला करने के लिए परमाणु हथियार तैयार कर रहा है। वहीं, भारत लंबी दूरी तक यानी चीन तक मार करने वाले हथियारों की तैनाती पर फोकस कर रहा है।
भारत और पाकिस्तान के पड़ोसी और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति चीन के पास परमाणु हथियारों की संख्या 22 फीसदी इज़ाफे के साथ 410 वॉरहेड से बढ़कर 500 हो गई है। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का अनुमान है कि चीन के पास 2030 तक 1,000 परमाणु हथियार हो जाएंगे।
‘सिपरी’ की रिपोर्ट के अनुसार रूस और अमेरिका के पास दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का 90 फीसदी भंडार है। रूस और अमेरिका ने कुल मिलाकर 2,500 पुराने परमाणु हथियार अपने भंडार में से निकाल दिए हैं. वो धीरे-धीरे उन्हें नष्ट कर रहे हैं। 1986 में दुनिया भर में परमाणु हथियारों की संख्या 70,000 थी जो अब कम हुई है।
1991 में दक्षिण अफ्रीका वह पहला देश बना, जिसने स्वैच्छिक तौर पर अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म किया। 1994 में सोवियत यूनियन टूटने के बाद यूक्रेन, बेलारूस और कजाखिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम रोक दिए थे। इसके बदले उन्हें अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन और रूस की ओर से सुरक्षा की गारंटी दी गई थी। इस दौरान परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से बचने और परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए कई समझौतों पर सहमति हुई है।
जुलाई 2017 में दुनिया परमाणु हथियारों से मुक्त होने के करीब पहुंच चुकी थी, जब 100 से अधिक देशों ने संयुक्त राष्ट्र के उस समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें उन पर पूरी पाबंदी लगाने की बात की गई थी। मगर, उस वक्त भी परमाणु शक्ति संपन्न बड़े देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस ने इस समझौते का बहिष्कार किया।
चीन सरकार का शुरुआत से यह रुख रहा है कि अगर परमाणु हथियारों पर बातचीत होती है तो पहले अमेरिका और रूस परमाणु हथियारों की संख्या में स्पष्ट रूप से लाएं। चीन का कहना है कि अमेरिका की इस मामले में दोहरी नीति है। वह यहां नहीं चलेगी।
हाल ही में बातचीत के दौरान नाटो के सेक्रेटरी जनरल मार्क रूट ने कहा कि दुनिया भर में परमाणु हथियारों से पैदा होने वाले तनाव में कमी की कोशिश रिपब्लिकन पार्टी की परंपरा रही है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने भी परमाणु हथियारों की संख्या कम करने के लिए रूस के नेता मिखाइल गोर्बाचेव से बात की थी। ट्रंप ने भी अपने पहले दौर में ऐसा ही किया था।
अमेरिका और रूस के बीच ‘न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी’ की अवधि फरवरी 2026 तक है। ऐसे में परमाणु हथियारों की संख्या नहीं बढ़ाने या उनमें कमी लाने के लिए बातचीत शुरू हो सकती है। एक्सपर्ट का कहना है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परमाणु हथियारों की सीमा बनाए रखने पर सहमति जताएं क्योंकि ऐसे समझौते से तनाव में कमी आ सकती है।
भारत का कहना है कि वह ‘नो फर्स्ट यूज’ परमाणु पॉलिसी पर यकीन रखता है, मगर 1998 से उसकी परमाणु नीति चीन को मद्देनजर रखकर बनाई गई है। अगर भारत की परमाणु रणनीति ने चीनी विस्तार पर प्रतिक्रिया दी तो इसका असर न केवल पाकिस्तान की परमाणु क्षमता बल्कि भारत-प्रशांत सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय परमाणु राजनीति पर भी होगा। जिस तरह से चीन प्रशांत महासागर और चीन सागर में अपना दबदबा कायम कर रहा है, उसे देखते हुए भारत कतई अपने परमाणु हथियारों में कटौती नहीं करेगा।











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