बागपत। एक सैनिक जीवन भर सैनिक ही रहता है। 85 वर्षीय बाबू खान का जज्बा देखकर आप भी यही कहेंगे। बुढ़ापे में भी पूर्व सैनिक बाबू खान पाकिस्तान सीमा पर पहुंचकर पाकिस्तान से लड़ने को तैयार हैं। वह कहते हैं-भारतीय सेना ने जिस तरह से पाकिस्तान में आतंकियों को मौत के घाट उतारा है, उससे दिल को ठंडक पहुंची है। शुरुआत से ही पाकिस्तान की फितरत है कि जब तक मार नहीं खाएगा, तब तक बाज नहीं आएगा। ऐसा कहकर पूर्व सैनिक बाबू खान उन यादों में खो गए, जब पाकिस्तान के साथ युद्ध में दो बार हिस्सा लिया। बोले कि मौका मिलने पर फिर पाकिस्तान से लड़ने को तैयार हूं।
वर्ष 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा। तब उन्होंने साथी सैनिकों के साथ लाहौर में घुसकर पाकिस्तानी सैनिकों को मारा था। वहां बिजली की लाइनों को तहस-नहस किया। पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था, लेकिन अपनी फितरत के मुताबिक नापाक हरकतें करने लगा।
फिर वर्ष 1971 में पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुझे भाग लेने का मौका मिला। कलकत्ता में बांग्लादेश सीमा पर लड़ाई लड़ी थी। पाकिस्तान सेना ने आत्मसमर्पण किया, जिन्हें बंदी बनाने का मुझे भी मौका मिला था। बांग्लादेश बनने पर युद्ध खत्म हो गया था।
बोले कि शुरू से ही पाकिस्तानी सेना मानवता विरोधी काम करती आई है। पहलगाम में पर्यटकों पर आतंकी हमला पाकिस्तान की कायराना हरकत थी। बोले कि सरकार मौका दे तो बॉर्डर पर पाकिस्तानियों से लड़ने को तैयार हूं। जरूरत पड़ने पर अपने चार बेटों तथा एक पौत्र को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए भी भेजने को तैयार हूं।











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