मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर जिले के द्वारका सिटी में प्लॉट खरीदने वालों पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। जीवन भर की कमाई लगाकर घर बसाने का सपना देखने वाले लोग अब कानूनी उलझनों में फंसकर भारी तनाव में जी रहे हैं। गुरुवार को कॉलोनी के दर्जनों निवासी जिला अधिकारी और मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण (एमडीए) के अधिकारियों से मिले और न्याय की गुहार लगाई।
सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई 2025 तक द्वारका सिटी में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। इस आदेश के बाद जिला प्रशासन ने कॉलोनी में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। अब हालात यह हैं कि कॉलोनी निवासी बिल्डर, प्रशासन और प्राधिकरण के बीच पेंडुलम की तरह झूल रहे हैं। बिल्डर कह रहे हैं कि मामला केवल चकरोड संख्या 21 का है, जबकि जिलाधिकारी और विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष कविता मीणा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए किसी भी निर्माण को मंजूरी नहीं दे रहे हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, द्वारका बालाजी नामक फर्म ने बिना किसी वैध भूमि स्वामित्व के प्लॉट की बिक्री कर दी। खरीदारों को सलाह दी जा रही है कि वे अपने प्लॉट का 12 साल का तहसील से रिकॉर्ड निकलवाकर असल स्थिति जानें कि जिसने उन्हें ज़मीन बेची थी, क्या उसने कभी वो ज़मीन खरीदी भी थी या नहीं ?, अगर खरीदी नहीं थी तो किसी और कंपनी द्वारा खरीदी गई ज़मीन उन्हें बेचने का हक़ कैसे मिला ?, कानून है कि रजिस्ट्री या विरासत से ही कोई ज़मीन का मालिक बन सकता है, लेकिन क्या द्वारिका बालाजी ने कभी ये ज़मीने खरीदी भी है, जिनका बैनामा किया है ?
इतना ही नहीं, इस मामले में स्टांप चोरी और फर्जी रजिस्ट्री के भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि बिल्डरों ने 11,380 वर्ग मीटर जमीन के बदले सरकार को दूसरी भूमि देने की बात कही थी, जिस पर तत्कालीन कमिश्नर ने आदेश भी पारित कर दिए थे। लेकिन 11 महीने बीत जाने के बाद भी न तो पूर्व जिलाधिकारी अरविंद मलप्पा बंगारी और न ही वर्तमान डीएम उमेश मिश्रा ने उसे लागू किया, ज़ाहिर है कि इतने ताकतवर लोग 11 महीने में दो कलेक्टरों के समय में भी ज़मीन परिवर्तन नहीं करा पाए, तो कुछ तो लफड़ा आदेश में रहा ही होगा।
आपको बता दे कि 9 जुलाई 2024 को एक बार आदेश के बाद 3 अगस्त 2024 को खतौनी में भूमि परिवर्तन का आदेश दर्ज भी हो गया था, लेकिन जैसे ही अफसरों को इसमें गड़बड़ झाला दिखाई दिया, 24 सितंबर 2024 में उन्होंने दोबारा आदेश करते हुए खतौनी से उस एंट्री को निरस्त कर दिया था।
होना तो यह चाहिए था कि पूर्व जिलाधिकारी द्वारा कराई गई जांच में यह स्पष्ट आने के बाद, कि भूमि परिवर्तन होने से पहले ही द्वारका सिटी के मालिकों ने सरकारी जमीन को काटकर प्लाटों में बेच दिया है और वहां बीजेपी नेता गौरव स्वरुप की पत्नी और नगर पालिका चेयरमैन मीनाक्षी स्वरुप समेत एसडी एसोसिएशन के नीरज कुमार समेत सभी नामवर लोगों ने अपनी अपनी कोठियों का निर्माण भी कर दिया है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेश वर्ष 2016 के तहत उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज होना चाहिए था और सरकारी बुलडोजर द्वारिका सिटी में इनकी कोठियों पर जाना चाहिए था, क्योंकि आज की तारीख तक भी इनकी कोठियों में सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा है, जिसे अपर जिलाधिकारी नरेंद्र बहादुर सिंह और विकास प्राधिकरण के सचिव समेत द्वारिका सिटी की जांच करने गई एसडीएम सदर निकिता शर्मा ने भी अपनी कमेटी की रिपोर्ट में साफ़ साफ़ लिख रखा है, लेकिन आज तक भी सरकारी बुलडोजर को इन बड़े लोगो के अवैध कब्जे पर कार्यवाही की फुर्सत ही नहीं मिली।
बिल्डर प्लॉट धारकों को कह रहे है कि विवाद केवल चकरोड नंबर 21 पर है जबकि मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण के सचिव ने तो 27 जुलाई 2023 में ही अजय बंसल को लिख कर बता दिया था कि आपने 76 सरकारी ज़मीन में 41 सरकारी ज़मीन बेच दी है, इसलिए विवाद केवल एक चकरोड का नहीं बल्कि 76 सरकारी चकरोड और नाली से जुड़ा है।
आपको पता ही है कि द्वारका सिटी से जुड़े कई बिल्डरों का नाम पहले भी सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे के मामलों में आ चुका है। फिर भी शासन इन भूमाफियाओं से ज़मीनें मुक्त नहीं करा पाया। यही कारण है कि बिल्डर फिलहाल बेफिक्र नजर आ रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट से राहत की उम्मीद में टिके हैं। लेकिन अगर 28 जुलाई को भी राहत नहीं मिली, तो कॉलोनी के सैकड़ों प्लॉटधारकों का भविष्य अधर में लटक सकता है, फिलहाल सभी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं। कॉलोनी निवासी अपनी चिंता खुलकर ज़ाहिर कर रहे हैं, वहीं एमडीए की उपाध्यक्ष कविता मीणा का पक्ष भी अहम है।











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