भोपाल। भोपाल में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की नेशनल गवर्निंग बॉडी मीटिंग में बोलते हुए, इस्लामिक स्कॉलर मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने जिहाद के पवित्र कॉन्सेप्ट को तोड़-मरोड़कर गाली-गलौज, अफरा-तफरी और हिंसा से जुड़े शब्दों में बदल दिया है।
“लव जिहाद,” “लैंड जिहाद,” “एजुकेशन जिहाद,” और “स्पिट जिहाद” जैसे शब्दों के इस्तेमाल से मुसलमानों को बहुत दुख हुआ है और धर्म का अपमान हुआ है। यह दुख की बात है कि सरकार और मीडिया में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने में कोई शर्म महसूस नहीं करते।
इस्लामिक स्कॉलर मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि देश में अभी के हालात बहुत सेंसिटिव और चिंताजनक हैं। दुख की बात है कि एक खास कम्युनिटी को टारगेट किया जा रहा है, जबकि दूसरों को कानूनी तौर पर कमज़ोर किया जा रहा है, समाज से अलग-थलग किया जा रहा है और आर्थिक रूप से बेइज्जत किया जा रहा है।
उनके धर्म, पहचान और वजूद को कमज़ोर करने के लिए मॉब लिंचिंग, बुलडोज़र एक्शन, वक्फ प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा, और धार्मिक मदरसों और सुधारों के खिलाफ़ नेगेटिव कैंपेन जैसे सिस्टमैटिक और ऑर्गनाइज़्ड तरीके से कोशिशें की जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि SIR भी किया जा रहा है, और यह एक बहुत ज़रूरी मुद्दा है। अगर हम इस पर कड़ी नज़र रखें, तो हम निराशा से बच सकते हैं, क्योंकि निराशा किसी भी समुदाय के लिए ज़हर है, और अगर किसी समुदाय को ज़िंदा रहना है तो इससे बचना और भी ज़रूरी है।
मदनी ने कहा कि देश में मुसलमानों के पक्ष में लगभग 10 प्रतिशत लोग हैं, जो विभिन्न कारणों से सहयोगी माने जा सकते हैं। वहीं लगभग 30 प्रतिशत लोग मुस्लिम समुदाय के विरोध की मानसिकता रखते हैं। उनके अनुसार, शेष लगभग 60 प्रतिशत लोग न तो पक्ष में हैं न ही विरोध में यह वही खामोश वर्ग है, जिसे फिरकापरस्त ताकतें प्रभावित करने की कोशिश कर रही हैं। मदनी का मानना है कि यदि यह वर्ग उग्र विचारधाराओं की ओर झुक गया, तो यह देश और मुसलमान दोनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत होगा।
उन्होंने कहा कि यदि सांप्रदायिक शक्तियों को सफल होने से रोकना है, तो समुदाय को ऐसी नेतृत्वकारी सोच विकसित करनी होगी जो मानवता की भलाई को प्राथमिकता दे और अपनी नुमाइंदगी के तौर-तरीकों में संतुलन लाए। मुसलमानों को अपनी भूमिका को समझते हुए समाज के साथ बेहतर रिश्ते बनाने चाहिए। उन्होंने परस्पर धर्म-सम्मान की आवश्यकता भी बताई, साथ ही यह भी कहा कि मुसलमानों को दूसरों तक इस्लाम की सच्चाई और मूल्यों को शांतिपूर्ण व रचनात्मक ढंग से पहुंचाना चाहिए।











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