लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के एक बयान ने बड़ा राजनीतिक भूचाल खड़ा कर दिया है। मसूद ने कहा है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के बजाय बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इस बयान के बाद कांग्रेस, सपा और बसपा के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। जानकारों का मानना है कि मसूद जैसे वरिष्ठ नेता इस तरह की टिप्पणी पार्टी की सहमति के बिना नहीं करते, खासकर तब जब वे सीधे हाईकमान के संपर्क में हों।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव लगातार यह दावा करते रहे हैं कि कांग्रेस के साथ उनके संबंध सामान्य हैं और गठबंधन की बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है। मगर इमरान मसूद के तीखे बयान इन दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने प्रदेश में छह सीटों पर जीत दर्ज की, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। अब कांग्रेस प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है, और उसे लगता है कि यह कार्य सपा से ज्यादा बसपा के साथ होकर आसान हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस, सपा पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। इमरान मसूद जैसे नेताओं के जरिए पार्टी यह संकेत दे रही है कि अगर सपा सहयोग नहीं करती तो कांग्रेस बसपा का रुख कर सकती है। कांग्रेस प्रवक्ता अंशु अवस्थी का बयान इस रणनीति की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा, “हम सभी का सामूहिक उद्देश्य भाजपा को 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता से हटाना है। सीटों के बंटवारे पर राष्ट्रीय नेतृत्व बातचीत करेगा।”
वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता की तरफ से साफ कर दिया गया है कि विधानसभा चुनाव 2027 में कांग्रेस को 35 से अधिक सीटें नहीं दी जाएंगी। यह बयान भी दरअसल उसी सियासी खींचतान का हिस्सा माना जा रहा है जो इन दोनों दलों के बीच चल रही है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की अटकलें तेज हैं कि क्या कांग्रेस वास्तव में बसपा से हाथ मिलाने की तैयारी में है? हालांकि जानकारों का मानना है कि बसपा किसी भी गठबंधन में जल्दबाजी नहीं करती और उसकी रणनीति हमेशा अपने दम पर चुनाव लड़ने की रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति में संभावनाओं को खारिज नहीं किया जा सकता।
बहरहाल इमरान मसूद के बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या कांग्रेस, सपा पर दबाव बना रही है या वह सच में अपने रास्ते अलग करने की तैयारी में है? क्या बसपा उसके लिए अगला ठिकाना बन सकती है? आने वाले समय में इस सियासी ड्रामे के कई नए अध्याय खुल सकते हैं।










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