ऋषिकेश। गुजरात के मोरबी में हुए केबल ब्रिज हादसे की गूंज ओर असर काफी दूर तक देखने के लिए मिल रहा है। इस हादसे मं अब तक 130 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि अभी भी शवों के निकलने का सिलसिला जारी है। ऐसे में देश में ऐसे ओर केबल ब्रिज पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है।
गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर केबल ब्रिज हादसे के बाद अब दूसरे शहरों में मौजूद ऐसे ही पुलों की हालत को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसी की तर्ज पर ऋषिकेश में बना पूरी दुनिया में प्रसिद्ध लक्ष्मण झूला भी है। पुल का सपोर्टिंग वायर टूटने के कारण उत्तराखंड सरकार ने साल 2019 में इस पर आवाजाही बंद कर दी थी, मगर, सरकार के फैसले ने स्थानीय लोगों की परेशानी बढ़ा दी थी।
बाद में लोगों की परेशानी देखते हुए पुल पर पैदल जाने की इजाजत दी गई थी. हालांकि, पुल पर पहले दोपहिया वाहनों की आवाजाही की भी होती थी. मगर, पुल कमजोर पड़जाने के चलते दोपहिया वाहनों की पर भी रोक लगा दी गई थी।
तीर्थ नगरी ऋषिकेश के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व रखने वाले लक्ष्मण झूला के उपयोग पर 13 जुलाई 2019 को रोक लगाई गई थी. टिहरी और पौड़ी को जोड़ने वाले इस पुल से केवल पैदल जाने वालों को ही जाने की अनुमति थी. हादसे के डर के चलते 13 अप्रैल 2022 को इस पुल से पैदल निकलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है।
बताया जाता है कि पहले लक्ष्मण झूला जूट की रस्सियों से बनाया गया था. रस्सों के इस पुल पर लोगों को छींके में बिठाकर खींचा जाता था. साल 1889 में कोलकता के सेठ सूरजमल झुहानूबला ने लोहे की तारों से इसका दोबारा निर्माण कराया था. उन्हें स्वामी विशुदानंद से इसकी प्रेरणा मिली थी. साल 1924 में आई तेज बाढ़ में झूला बह गया था. बाद में फिर से इसकी मरम्मत कर पहले के ज्यादा मजबूती के साथ इसका निर्माण किया गया था।
लक्ष्मण झूला के साथ पौराणिक कथा भी जुड़ी है. कथनानुसार, भगवान श्रीराम के अनुज लक्ष्मण ने इसी स्थान पर जूट की रस्सियों के सहारे नदी को पार किया था।










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