नई दिल्ली : होली का पर्व हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। यह रंगों का त्योहार है, जो इस साल 14 मार्च, शुक्रवार को मनाया जाएगा। होली से एक दिन पहले होलिका दहन 13 मार्च को किया जाएगा, जिसे छोटी होली भी कहा जाता है। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होलिका दहन किया जाता है।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त
– होलिका दहन की तिथि: 13 मार्च (गुरुवार) सुबह 10:35 बजे से 14 मार्च दोपहर 12:23 बजे तक
– होलिका दहन का शुभ समय: 13 मार्च रात 11:26 बजे से 14 मार्च रात 12:30 बजे तक
– भद्रा काल: 13 मार्च सुबह 10:35 बजे से रात 11:26 बजे तक
होलिका दहन के लिए एक लकड़ी की टहनी को भूमि में गाड़कर उसके चारों ओर लकड़ियां, उपले और कंडे रखे जाते हैं। शुभ मुहूर्त में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है, जिसमें गोबर के उपले, गेहूं की बालियां और उबटन अर्पित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह अग्नि नकारात्मक शक्तियों को दूर कर व्यक्ति को पूरे वर्ष स्वस्थ रखती है। होलिका दहन के बाद राख को घर लाकर तिलक लगाने की परंपरा भी है।
ब्रज क्षेत्र: मथुरा और वृंदावन में 15 दिनों तक होली के रंग देखने को मिलते हैं। बरसाना में लठमार होली खेली जाती है।
होली के दिन के शुभ कार्य
1. सुबह स्नान के बाद भगवान को रंग अर्पित कर आशीर्वाद लें, फिर होली खेलें।
2. होलिका दहन की भस्म को पुरुष मस्तिष्क पर और महिलाएं गले पर लगाएं, इससे सुख-समृद्धि बढ़ती है।
होलिका दहन का संबंध भक्त प्रह्लाद और असुर राजा हिरण्यकश्यप की कथा से है। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद की भगवान विष्णु में भक्ति से नाराज था। उसने अपनी बहन होलिका, जिसे आग में न जलने का वरदान था, से प्रह्लाद को जलाने के लिए कहा। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई। तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भावना और आपसी भाईचारे का संदेश भी देती है।











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