मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर में जानसठ रोड पर बन रही द्वारिका सिटी के साथ जुड़ा हुआ है मामला, जिस कॉलोनी में मंत्री और सांसद के परिवारजन साझेदार हों, तो भला उसे किसी कायदे कानून और अफसर के आदेश की परवाह क्यों करनी चाहिए?, तभी तो किसी भी कानून से बेफिक्र, द्वारिका सिटी के बिल्डर ने बिना कोई ज़मीन अपने नाम ख़रीदे, सैंकड़ों लोगों को प्लाट बेच दिए, और तो और, सरकारी ज़मीन पर भी प्लाट काटकर 41 प्लाट भी लोगों को बेच दिए। ऐसा नहीं है कि किसी सरकारी अफसर को पता न चला हो ? , पता तो सबको चला और सरकारी चिट्ठी भी जारी हुई, लेकिन पैसे वालों के सामने सिस्टम मौन बनकर ये धांधली सिर्फ देखता रहा।
आपको पता ही है कि मुज़फ्फरनगर में पिछले कुछ दिनों से द्वारिका सिटी लगातार चर्चाओं में बनी हुई है । उत्तरी सिविल लाइन निवासी गुंजन गुप्ता ने द्वारिका सिटी में अनियमितताओं को लेकर लगातार शिकायतें करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी,जिस पर 27 मई को सुप्रीम कोर्ट ने स्टे आर्डर जारी कर दिया था, जिसके बाद से लगातार हंगामा मचा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी द्वारिका सिटी में काम नहीं रुके, तो गुंजन गुप्ता ने जिलाधिकारी उमेश मिश्रा और मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष कविता मीणा से संपर्क किया और कविता मीणा को लिख कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी वे कार्रवाई नहीं कर रही है, तो वह उनके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा दायर करेंगे, इसके बाद कविता मीणा ने ड्रोन से द्वारिका सिटी की निगरानी शुरू करा दी और अपने अफसरो की ड्यूटी लगा दी कि वे भी निरंतर द्वारिका सिटी में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन सुनिश्चित करें।
जिसके बाद से वहां रोज हंगामा मच रहा है, द्वारिका सिटी के मालिकों ने वहां निर्माण कर रहे भवन स्वामियों और निवासियों के माध्यम से जिला प्रशासन और विकास प्राधिकरण पर दबाव बनाना शुरू किया कि केवल चकरोड संख्या 21 को लेकर विवाद है, तो पूरी कॉलोनी में निर्माण कार्यों पर रोक क्यों लगाई गई है ?
इस संबंध में शिकायतकर्ता गुंजन गुप्ता ने बताया कि इस कॉलोनी में 76 सरकारी भूमि है, जिनमें से 41 को बिल्डर प्लॉट काटकर बेच चुके हैं,जिनके विषय में विकास प्राधिकरण के अधिशासी अभियंता ने बिल्डर अजय बंसल को बाकायदा नोटिस भी जारी किया था।
गुंजन गुप्ता का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार के शासनादेश संख्या-32/744/2016 दिनांक 03.06.2016 में स्पष्ट रूप से कहा गया है: “जनपद /मंडल/शासन स्तर पर भूमि के पुनर्ग्रहण आदेश निर्गत होने से पूर्व कोई भी निर्माण कार्य आरंभ नहीं किया जा सकता।” फिर भी सरकारी ज़मीन के नाम परिवर्तन से पहले,यदि कोई व्यक्ति सरकारी ज़मीन पर कोई निर्माण कर लेता है तो जिलाधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि उसके खिलाफ सरकारी ज़मीन पर कब्जे के मामले में क़ानूनी कार्यवाही करे, इस मामले में 21 जुलाई 2023 में विकास प्राधिकरण सरकारी ज़मीन को प्लाट काटकर बेच देने का नोटिस भी जारी करता है और कमिश्नर ने 9 जुलाई 2024 को बिल्डर के पक्ष में ज़मीन ट्रांसफर करने के आदेश जारी किये थे, जिन पर दो साल बाद, आज तक भी भूमि का ट्रांसफर बिल्डर के पक्ष में नहीं हुआ है, इस बीच प्राधिकरण, ज़िले में सैकड़ों जगह सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण बताकर बुलडोजर चला चुका है, पर इनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं, विकास प्राधिकरण से बिल्डर का यह रिश्ता क्या कहलाता है ?
गुंजन गुप्ता का कहना है कि बिल्डर यह कह रहे हैं कि उन्होंने सही प्लॉट बेचे हैं । उन्होंने सभी प्लॉट खरीदने वालों से अनुरोध किया है कि वे भी एक बार अपने प्लॉट का तहसील से 12 साल का विवरण निकलवा ले, जिससे उन्हें खुद ही स्पष्ट हो जाएगा कि जिस द्वारका बालाजी ने उन्हें प्लॉट बेचा है, उसने वह प्लॉट खरीदा ही नहीं था ? अगर खरीदा ही नहीं था, तो उसे बेचने का हक द्वारका बालाजी को कहां से मिल गया ?
उन्होंने बताया कि द्वारका बालाजी ने जो प्लॉट बेचे, इनमें यह भी गलत लिखा है कि द्वारका बालाजी को उत्तर प्रदेश सरकार कुछ जमीन अधिगृहित करके देगी, इसके बाद ही द्वारका बालाजी के मालिक वहां विकास कार्य करेंगे, इसके बारे में कमिश्नर ने सख्त आपत्ति की थी और विकास प्राधिकरण ने अजय बंसल को चिट्ठी भेज कर यह स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे सभी प्लॉट क्रेताओं को सूचित करके उनके बैनामों को संशोधित करा दें और भविष्य में भी किसी बैनामे में ऐसा उल्लेख न करें, लेकिन कमिश्नर के इस आदेश को भी द्वारिका सिटी के मालिकों ने धुंए में उड़ा दिया।
गुंजन गुप्ता ने बताया कि इन्ही सरकारी चकरोडों और नालियों पर मीनाक्षी स्वरूप समेत नितिन बंसल, विवेक बंसल, विनीत बंसल ,सोनिया जैन, संध्या सिंघल, राकेश कुमार गोयल, छाया सिंघल,अनीता मित्तल,मुनीश्वर कुमार आदि के प्लाट समेत,एस डी एसोसिएशन से जुड़े नीरज कुमार, की कोठी का भी निर्माण हुआ है, उनकी पत्नी प्रीति कुमार के नाम प्लॉट खरीदा गया है।
आपको बता दें कि ये नीरज कुमार वही है, जिनका नाम कुछ वर्ष पूर्व तब भी सुर्खियों में रहा था जब तत्कालीन जिलाधिकारी चंद्र भूषण सिंह ने इनके बनाए एस डी कॉलेज मार्केट को सरकारी संपत्ति बताते हुए उसके विरुद्ध कार्रवाई शुरू कर दी थी। 5000 करोड़ की इस सरकारी संपत्ति पर नीरज कुमार और उनके परिवार के अवैध कब्जे को लेकर कार्रवाई शुरू हुई थी तो यह हाईकोर्ट से स्टे ले आए थे कि नगर पालिका द्वारा जो नोटिस इन्हें दिया गया है, वह ठीक नहीं है, तत्कालीन जिलाधिकारी नोटिस को ठीक कर पाते, इसी बीच उनका तबादला हो गया था और यह मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया था। एसडी एसोसिएशन पर भी करोड़ों रुपए की हजारों करोड़ की सरकारी संपत्ति पर कब्जे का लगातार आरोप लगता रहा है, इसके विषय में सैकड़ों जांच होकर आरोप प्रमाणित भी हो चुके है, साक्ष्य भी हैं लेकिन आज तक उन पर भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाई है।










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