मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के पहले उपमुख्यमंत्री, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और किसानों के पुरोधा बाबू नारायण सिंह की 38वीं पुण्यतिथि पर शुक्रवार को नसीरपुर गांव एक बार फिर इतिहास की गूंज से भर उठा। हजारों की भीड़, देशभक्ति की गूंज और जननेता की याद में छलकती आंखें – सबने मिलकर इसे श्रद्धा और संकल्प का आयोजन बना दिया।
इस पुण्यतिथि समारोह में आम ग्रामीणों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों तक, हर वर्ग की भागीदारी ने साबित कर दिया कि बाबू नारायण सिंह की स्मृतियां सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में आज भी जीवंत हैं।
सुबह से ही श्रद्धालुओं का सैलाब कार्यक्रम स्थल पर उमड़ने लगा। हवन, सामूहिक प्रार्थना और विचार गोष्ठियों के माध्यम से उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। हर चेहरा भावुक था और हर शब्द श्रद्धा से भरा।
कार्यक्रम में जिलाधिकारी उमेश मिश्रा, एसएसपी संजय कुमार वर्मा, सीएमओ डॉ. सुनील तेवतिया, एडीएम प्रशासन, एडीएम फाइनेंस और एसडीएम सदर निकिता शर्मा समेत जिले के तमाम वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। प्रशासन की यह उपस्थिति दर्शाती है कि बाबू नारायण सिंह केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जनसेवा के आदर्श भी थे।
बिजनौर के सांसद चंदन चौहान, जो बाबूजी के पोत्र हैं, ने अपने उद्बोधन में भावुक होकर कहा कि “बाबूजी ने जो परंपरा सेवा की शुरू की थी, उसे हम कभी टूटने नहीं देंगे। जनता की सेवा ही हमारा धर्म है।”
कार्यक्रम में राज्य मंत्री सोमेंद्र तोमर और राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने भी शिरकत की। दोनों नेताओं ने बाबू नारायण सिंह को स्वतंत्र भारत के उन नेताओं में गिना, जिन्होंने सादगी, संघर्ष और सेवा को राजनीति की आत्मा बनाया।
समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक, सपा जिलाध्यक्ष जिया चौधरी, पूर्व विधायक प्रमोद त्यागी समेत तमाम किसान नेता और सामाजिक संगठन भी इस पुण्य स्मृति समारोह में शामिल हुए। वक्ताओं ने कहा कि बाबू नारायण सिंह वह जननायक थे जिन्होंने सत्ता को कभी भोग नहीं, सेवा माना।
बाबू नारायण सिंह का जीवन संघर्षों से भरा रहा। वे स्वतंत्रता संग्राम में जेल गए, किसानों के हक में आंदोलन किए, और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के तौर पर ऐतिहासिक निर्णय लिए। उनका संपूर्ण जीवन ग्रामीणों, किसानों और वंचितों की आवाज बनने में बीता।
नसीरपुर गांव में इस दौरान देशभक्ति के गीत गूंजते रहे, मंच पर उनकी जीवन यात्रा से जुड़े चित्र और पोस्टर लोगों को प्रेरणा दे रहे थे। हजारों की संख्या में मौजूद जनसमूह ने अंत में राष्ट्र और समाज के लिए काम करने का संकल्प लिया। यह आयोजन केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह प्रमाण था कि बाबू नारायण सिंह जैसे नेता देह से भले चले जाएं, पर विचारों में पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।










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